Sunday, September 1, 2019

कर्मफल तो भोगना ही पड़ेगा

कर्मफल तो भोगना ही पड़ेगा!!!!!

यदि ईश्वर कोई ऐसी व्यवस्था करता कि झूठ बोलते ही आदमी की जीभ में छाले पड़ जाते , चोरी करते ही हाथ में फोड़े हो जाते , बेईमानी करने से बुखार आ जाता , किसी पर कुदृष्टि डालते ही आंखें दु:खने लगतीं , कुविचार आते ही सिरदर्द हो जाता तो शायद किसी के लिए भी दुष्कर्म करना संभव न होता। लोग जब उससे लाभ की अपेक्षा हानि देखते तो दुष्कर्म करने की हिम्मत स्वयं न करते। लेकिन ईश्वर ने ऐसा न करके , मनुष्य के भीतर छुपी मानवता की हत्या होने से रोका।

 दंड भय से तो विवेक रहित पशु को भी अवांछनीय मार्ग पर चलने से रोका जा सकता है। लाठी के बल पर भेड़ों को इस या उस रास्ते पर चलाने में गड़रिया सफल रहता है। सभी जानवर इसी प्रकार दंड-भय दिखाकर अमुक प्रकार से जाते जाते हैं। यदि हर काम का तुरंत दंड मिलता और ईश्वर बलपूर्वक अमुक मार्ग पर चलने के लिए विवश करता , तो फिर मनुष्य भी पशुओं की श्रेणी में आता , उसकी स्वतंत्र आत्मचेतना विकसित हुई या नहीं , इसका पता ही नहीं चलता। 

भगवान ने मनुष्य को भले या बुरे कर्म करने की स्वतंत्रता इसलिए प्रदान की है कि वह अपने विवेक को विकसित करके भले-बुरे का अंतर करना सीखे और दुष्परिणामों के शोक-संतापों से बचने एवं सत्परिणामों का आनंद लेने के लिए स्वत: अपना पथ निर्माण कर सकने में समर्थ हो। इस आत्मविकास पर ही जीवनोद्देश्य की पूर्ति और मनुष्य जन्म की सफलता अवलम्बित है। 

इसके बावजूद उसने कर्मफल दंड विधान की व्यवस्था कदम-कदम पर बना भी रखी है। यों समाज में भी कर्मफल मिलने की व्यवस्था है और सरकार द्वारा भी उसके लिए साधन जुटाए गए हैं। पुलिस , जेल- ऐसे प्रबंध किए गए हैं कि अनाचार करने वालों को रोका और दंडित किया जा सके। समाज में कुकर्मियों का तिरस्कार और अविश्वास भी होता है , लोग उनका सहयोग , समर्थन नहीं करते और संपर्क बनाने से बचते हैं। 

झंझट मोल न लेने की कायरता से डरकर कोई प्रत्यक्ष विरोध कर संघर्ष न करे , चुप भले ही बैठा रहे , पर अनैतिक व्यक्ति को सच्चे मन से प्यार कोई नहीं कर सकता। व्यभिचारी भी अपने घर में दूसरे व्यभिचारी का और चोर भी अपने घर में दूसरे चोर का प्रवेश नहीं होते देता , क्योंकि वह उसे अविश्वस्त मानता है। भीतर ही भीतर घृणा करता है और चाहता है कि वह सांप , बिच्छू की तरह अलग ही बना रहे। 

कुकर्मी थोड़े से साधन भर इकट्ठे कर सकते हैं और उनसे यत्किंचित शरीर एवं इंद्रियों का क्षणिक सुख भोग सकते हैं , पर सामाजिक प्रणाली होने के नाते जिस श्रद्धा , सम्मान , प्यार और सहयोग की उन्हें भारी भूख और आवश्यकता रहती है , वह उन्हें सदा अप्राप्त ही रहता है। सामाजिक असहयोग और तिरस्कार एक ऐसा दंड है जो अप्रत्यक्ष होते हुए भी मनुष्य को घर में रहने वाले भूत पिशाच की तरह उद्विग्न और संत्रस्त रखता है। यह स्थिति कम कष्टकारक नहीं है। 

इससे भी बढ़कर एक और दंड व्यवस्था आत्मप्रताड़ना है। पापी मनुष्य एक क्षण के लिए भी शांति अनुभव नहीं कर सकता। भीतर की प्रताड़ना बाहरी दंडों से अधिक हानिकारक होती है। उसके कारण व्यक्ति निरंतर दुर्बल , उद्विग्न , एकाकी , नीरस और विक्षिप्त बनता चला जाता है। व्यक्तित्व को हेय , पतित और अस्त-व्यस्त बनाने में आत्मग्लानि का सबसे बड़ा योगदान होता है।

 इन तीनों से परिवर्तन की अनुकूलता नहीं दिखी तो ईश्वर का सीधे हस्तक्षेप होता है। आज नहीं तो कल उसकी व्यवस्था के अनुसार कर्मफल मिलकर ही रहेगा। देर हो सकती है , अंधेर नहीं। सरकार और समाज से पाप को छिपा लेने पर भी आत्मा और परमात्मा से उसे छुपाया नहीं जा सकता। इस जन्म या अगले जन्म में हर बुरे-भले कर्म का प्रतिफल निश्चित रूप से भोगना पड़ता है। 

ईश्वरीय कठोर व्यवस्था उचित न्याय और उचित कर्मफल के आधार पर ही बनी हुई है। कर्मफल एक ऐसा अमिट तथ्य है जो आज नहीं तो कल भोगना ही पड़ेगा। कभी-कभी इन परिणामों में देर इसलिए होती है कि ईश्वर मानवीय बुद्धि की परीक्षा करना चाहता है कि व्यक्ति अपने कर्त्तव्य व धर्म समझ सकने और निष्ठापूर्वक उनका पालन करने लायक विवेक बुद्धि संचित कर सका या नहीं।

 जो दंड भय से डरे बिना दुष्कर्मों से बचना मनुष्यता का गौरव समझता है और सदा सत्कर्मों तक ही सीमित रहता है , समझना चाहिए कि उसने सज्जनता की परीक्षा पास कर ली और पशुता से देवत्व की ओर बढ़ने का शुभारंभ कर दिया।

ग्रह शांति के अचूक 50 सूत्र

ग्रह शांति के अचूक 50 सूत्र

ॐ नमः जय स्वाहा – दिन में कम से कम एक बार बोलने से सभी कार्य बनते है।

प्रत्येक को अपने घर में कल्पवृक्ष,कामधेनु व चिंतामणि रत्ना का चित्र रखना चाहिए।

व्रतियों, महाव्रतियों को आहार करना चाहिए।

साकार परमात्मा की उपासना करना चाहिए।

प्रतिदिन दान करना चाहिए।

अतिथि सेवा।

दिन में ब्रहमचर्य का पालन।

अवस्त्र स्नान नहीं करना।

माता – पिता का आदर करना।

कुटुम्बी जनों से बैर न करना।

अपनों से बड़ों का आशीर्वाद लेना।

व्यसनों का त्याग करना।
प्रसन्नचित होकर भोजन करना।

सूर्य की ओर मल का त्याग न करना।

ऋण चुकाया जाना चाहिए।

झूठे बर्तन रात्रि में नहीं छोड़ना चाहिए।

टूटे बर्तन, टूटा दर्पण घर में नहीं रखना चाहिए।

पिता को दुखी करके धन नहीं लेना।

सभी के सुखी जीवन की कामना करना।

कृतघ्नी व्यक्ति की कभी दोस्ती न करना।

जानवरों को भोजन देना।

असहाय की सेवा करना।

विकलांगों पर दया करना।

अपने माकन में कहीं कच्ची जगह छोड़ देना चाहिए।

नैऋत्य कोण में घर के दरवाजे वाले घर का त्याग कर देना चाहिए।

घर में कोई छेद न हो।

लोभ में आकर चोरी का पात्र धारण न करें।

बुआ, बहन, बेटी आदि के लिए उपहार देना चाहिए।

अबला, कन्या, विधवा पर हाथ न उठाएं।

सम्बन्धी से मित्रता का व्यवहार रखें, दुश्मनी न करें
जहाँ कहीं भी रहते है उस परिवेश में प्रेम पूर्वक व्यवहार करें, उपेक्षा न करें।

व्यक्ति सफाई से रहे।

स्त्रियों को नाक व कान छिदवाना चाहिए।

कपडे व्यवस्थित पहने।

शाकाहारी वस्तुओं का उपयोग करें।

अपशब्दों का प्रयोग न करें।
सुबह उठते सबसे पहले अपने हाथों की हथेली देखें।

हथेली और तलवे सोने से पहले साफ़ करके सोना चाहिए
खड़े खड़े पानी न पीयें।

भोजन बनाते बनाते भोजन न करें।
जिस माकन में दरवाजे आवाज़ करते हैं उस घर में न रहे,उसमे तेल लगाकर रहे।

अलमारी व पलंग हिलते न हो।

बीम के नीचे शयन व आसन न हो।

भगवन व गुरु को पीठ देकर बैठने वाले व्यक्ति के गृह दोष निवारण का उपाय कारगर नहीं होता।

धर्मग्रन्थ को अपने से नीचा आसन न दें।

अक्षरों पर पैर नहीं रखना चाहिए।

बंद घडी, टूटी केसेट, सी डी, आदि को घर में नहीं रखना चाहिए।

ईशान दिशा में शौचालय नहीं होना चाहिए।

नैऋत्य कोण में यदि कर्मचारी अथवा अतिथियों का वास है और अग्नि कोण में जल का प्रवास हो तो द्वन्द ही होगा।

कारको भाव नाशाय

आचार्य डॉ0 विजय शंकर मिश्र (प्रशासनिक सेवा) 
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कारको भाव नाशाय 
 
जन्मकुंडली के बारह भाव मानव जीवन के विभिन्न अवयवों को दर्शाते हैं। किसी भाव के फल का विचार करते समय सर्वप्रथम उस भाव और भावेश के बल का आकलन किया जाता है। जिस भाव में उसके स्वामी या शुभ ग्रह की स्थिति हो, या उनकी दृष्टि पड़ती हो, तब वह भाव बलवान होकर शुभ फलदायक होता है। इसके विपरीत स्थिति में वह भाव निर्बल होकर शुभ फल नहीं देता है। जब भाव का स्वामी स्रवोच्च, मित्र या स्वराशि में स्थित होकर शुभ भावाधिपतियों से संबंध बनाता है तब वह बलवान होता है और अपने स्वामित्व भाव का उत्तम फल देता है। भावेश का बली होना भाव की शुभता बढ़ाता है। भाव व भावेश के साथ ही उस भाव के 'नित्य कारक' ग्रह का भी आंकलन आवश्यक होता है। 'भाव कारक', 'वस्तु कारक', 'योग कारक' व 'जैमिनी कारक' सर्वथा भिन्न हैं। महर्षि पाराशर ने प्रत्येक भाव का एक 'नित्य कारक' निर्धारित किया था - सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुभौमः सितः शनिः। गुरुंचन्द्रसुतो जीवो मन्द´च भावकारकाः।। परंतु कालांतर में रचित ज्योतिष ग्रंथों में वर्णित 'नित्य भावकारक' इस प्रकार हैं- प्रथम भाव -सूर्य, द्वितीय भाव-बृहस्पति, तृतीय भाव-मंगल, चतुर्थ भाव - चंद्र व बुध, पंचम भाव -बृहस्पति, षष्ठ भाव -शनि व मंगल, सप्तम भाव - शुक्र, अष्टम भाव - शनि, नवम भाव - सूर्य व बृहस्पति, दशम भाव - सूर्य, बुध, बृहस्पति व शनि, एकादश भाव - बृहस्पति, द्वादश भाव - शनि। फलदीपिका ग्रंथ (15, 25) के अनुसार- तस्मिन भावे कारके भावनाथे वीर्योपेते तस्य भावस्य सौरव्यम्। अर्थात्, "जब भाव, भावेश और कारक तीनों बलवान हों तब उस भाव का अच्छा फल व्यक्ति को प्राप्त होता है।" 'भाव प्रकाश' ग्रंथ के अनुसार- भवन्ति भावभावेशकारका बलसंयुताः। तदा पूर्ण फलं द्वाभ्याम एकेनाल्प फलं वदेत्।। अर्थात् " यदि भाव, भाव का स्वामी तथा भाव का कारक तीनों बलवान हों तब उस भाव का पूर्ण फल कहना चाहिए, और यदि तीन में से दो बलवान हों तो आधा फल कहना चाहिए, तथा केवल एक ही बलवान होने पर बहुत थोड़ा फल होता है। 'जातक पारिजात' ग्रंथ (अ. 2-51) ने प्रचलित भाव कारकों का विवरण देने के बाद अगले श्लोक (अ. 2-52) में कहा है कि यदि शुक्र, बुध और बृहस्पति लग्न से क्रमशः सप्तम, चतुर्थ और पंचम भाव में हानिप्रद होते हैं तथा शनि अष्टम भाव में शुभ फल करता है। ज्ञातव्य है कि उपरोक्त ग्रह इन भावों के कारक माने गये हैं। परंतु 'भावार्थ रत्नाकर' ग्रंथ के रचयिता श्री रामानुजाचार्य ने निम्न श्लोक में सभी कारक ग्रहों को संबंधित भाव में हानिकारक बताया है- सर्वेषु भाव स्थानेषु तत्त्द भावादिकारकः। विद्यते तस्यभावस्य फलमस्वंल्पमुदीरितय्।। अर्थात्, "सभी कारक ग्रह अपने संबंधित भाव में स्थित होने पर उस भाव के फल को बहुत कम करते हैं।" उपरोक्त शलोक कालांतर में "कारको भाव नाशाय" नामक लोकोक्ति के रूप में प्रचलित हो गया। इसी आधार पर बृहस्पति का पंचम भाव में होना पुत्र अभाव का सूचक, शुक्र की सप्तम भाव में स्थिति वैवाहिक सुख का अभाव सूचक, तथा छोटे भाई के कारक मंगल ग्रह का तृतीय भाव में सिथति छोटे भाई के अभाव का सूचक कहा जाता है। अपवाह स्वरूप केवल शनि ग्रह का अष्टम (आयु) में होना दीर्घायु देता है। 'कारको भाव नाशाय' के पीछे जो हेतु  है उस पर विचार करने से ज्ञात होता है कि जब किसी भाव का कारक उसी भाव में स्थित होता है तब साझे विषय के दो द्योतक (भाव व कारक) इकट्ठे होंगे और उन पर किसी पापी ग्रह का प्रभाव होने पर उनके साझे तथ्य की हानि होगी। वहीं शनि ग्रह की अष्टम आयु) भाव में स्थिति अपनी धीमी चाल से आयु को बढ़ायेगा। अनुभव में भी आता है कि जब भाव में उसका कारक शत्रु राशि में या अशुभ प्रभावी होने पर ही उस भाव के फल में कमी आती है। परंतु जब कोई ग्रह उस भाव में स्थित हो जिसका वह कारक है और वह स्वराशि अथवा मित्र राशि में स्थित हो वा शुभ दृष्ट हो तब अवश्य ही भाव फल की वृद्धि होती है। जैसे तृतीय भाव में मंगल यदि स्वराशि या मित्र राशि में हो और शुभ दृष्ट हो तो जातक का भाई अवश्य होता है। इसी प्रकार चतुर्थ भाव में चंद्रमा शुभ राशि में शुभ दृष्ट होने पर माता दीर्घजीवी होती है तथा सप्तम भाव में शुभ राशि स्थित व दृष्ट शुक्र वैवाहिक सुख देता है। उपरोक्त तथ्य को दर्शाती कुछ कुंडलियां प्रस्तुत हैं। 1. पुरुष: 14.9.1938, 23.36, झांसी भ्रातृकारक मंगल तृतीय भाव में मित्र सिंह राशि में भावेश सूर्य के साथ है। मंगल अपनी मूल त्रिकोण राशि से पंचम भाव में है। लग्नेश बुध तृतीय भाव में मित्र सूर्य के साथ है। तृतीय भाव स्थित ग्रहों पर बृहस्पति की सप्तम दृष्टि है। जातक के दो छोटे भाई हैं। इसके विपरीत श्री जवाहर लाल नेहरू की कुंडली देखिये। 2. 14.11.1889, 23.03 इलाहाबाद भ्रातृकारक मंगल तृतीय भाव में अपनी शत्रु राशि कन्या में स्थित है। मंगल अपनी मूल त्रिकोण राशि से षष्ठ भाव में स्थित है। उस पर कोई शुभ दृष्टि नहीं है। तृतीयेश बुध पर शनि और राहु की दृष्टि है और वह 'पापकर्तरी योग में है। सर्वविदित है कि नेहरूजी का छोटा भाई नहीं था। यह स्थिति भाव, भावेश व भाव कारक की अशुभ स्थिति का फल था। 3. स्त्री: 5.5.1963, 16.40, भटिंडा (पंजाब) जातिका की कन्या लग्न है। उसमें पक्षबली एकादशेश चंद्रमा स्थित है। सप्तम भाव में पति कारक स्वक्षेत्री बृहस्पति और कलत्रकारक उच्च शुक्र की युति है तथा उन पर पक्षबली चंद्रमा की दृष्टि है। अतः शनि ग्रह की सप्तम भाव पर दृष्टि विशेष अशुभ न कर पाई। जातिका अति सुंदर और सुशील है, तथा सौभाग्यशाली जीवन व्यतीत कर रही है। इसके विपरीत ब्रिटिश राजकुमारी डायना की कुंडली का अवलोकन कीजिए। 4. 1.7.1961, 17.00, लंदन (यू.के.) कुंडली में कलत्रकारक शुक्र सप्तम भाव में स्वक्षेत्री है जिससे उनका ब्रिटिश राजघराने में विवाह हुआ। परंतु शुक्र पर नीच व वक्री तथा शनि पीड़ित बृहस्पति की दृष्टि है। शुक्र से चतुर्थ केंद्र में मंगल और राहु स्थित हैं। जिससे उनकी कामुकता में वृद्धि हुई और उनके कई व्यक्तियों से तथाकथित संबंध बने और अपने पति से तलाक हुआ। यह सब कलत्रकारक शुक्र पर दुष्प्रभाव के कारण हुआ। 5. श्री लाल बहादुर शास्त्री, पूर्व प्रधानमंत्री 2.10.1904, 11.42, वाराणसी पुत्रकारक बृहस्पति पंचम भाव में मित्र राशि मेष में स्थित है। पंचमेश मंगल पंचम से पंचम (नवम) भाव में अपनी मित्र सिंह राशि में है तथा उस पर बृहस्पति की दृष्टि है। पंचम भाव पर स्वक्षेत्री शुक्र की भी दृष्टि है। सभी जानते हैं कि उनके दो पुत्र थे। 6. पुरुष: 27.5.1967, 14.45, लखनऊ कुंडली में माता का कारक चतुर्थ भाव में स्थित है। चंद्रमा पर मंगल, शनि और राहु की दृष्टि है। परंतु चंद्रमा पक्षबली है तथा शुक्र से दृष्ट है। चंद्रमा का उच्च बृहस्पति से राशि विनिमय है। इस प्रकार चंद्रमा बलवान है। चंद्रमा से अष्टम (आयु) भाव में उच्च बृहस्पति ने भी माता को दीर्घायु बनाया, यद्यपि उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। चंद्रमा पर शुभ प्रभाव के कारण 'कारको भाव नाशाय' निष्प्रभावी रहा। इस संबंध में आचार्य मंत्रेश्वर के विचार प्रस्तुत हैं। 'फलदीपिका' ग्रंथ (15.17) में उन्होंने सर्वमान्य भाव कारको का उल्लेख किया है तथा श्लोक 15-25 में कहा है कि भाव का शुभ फल पाने के लिये भाव, भावेश व भाव कारक को बलवान होना चाहिए। परंतु श्लोक 15.26 में स्वयं का विचार न देते हुए कहा है: धर्मे सूर्यः शीतगुर्बन्धुभावे शौर्य भौमः पंचमे देवमन्त्री। कामे शुक्रश्चाष्टमे भानुपुत्रः कुर्यात्तस्य क्लेशमित्याहुरन्ये।। अर्थात्, "अन्य आचार्यों का मत है कि नवम भाव में सूर्य, चतुर्थ में चंद्रमा, तृतीय भाव में मंगल, पंचम भाव में बृहस्पति, सप्तम भाव में शुक्र तथा अष्टम भाव में शनि, इन भावों के लिए कष्टकारी होते हैं। श्लोक के अंत में 'क्लेशभित्याहुरन्ये' का प्रयोग उनकी 'कारकोभावनाशाय' से सहमति नहीं दर्शाता। आचार्य कालिदास ने भी अपने ग्रंथ 'उत्तरकालामृत' (अध्याय 4.12) में भाव के शुभ फल प्राप्ति के लिए भाव, भावेश व भावकारक का बलवान होना आवश्यक बताया है। इनके बल आंकलन व आपसी संबंध के बारे में मार्गदर्शन करते हुए उन्होंने कहा हैः भावानां फलकारकाश्च विमुखा नैसर्गिकाश्चाय यद्भावेशान्वितमांशपावपि तथा तद्भावत्कारकौ। यद्यत्कारकराशिगो शुभखगस्त तत्फलध्वंसकस्तत्तत्कारक भावयोगवशतः स्वल्पं फलं कारयेत्।। अर्थात, "यदि किसी भाव के स्वामी तथा उस भाव के कारक में नैसर्गिक शत्रुता हो, अथवा किसी भाव तथा उसके कारक की उन ग्रहों से शत्रुता हो, जो कि भावेशाधिष्ठित राशि तािा नवांश के स्वामी हैं, तो उस भाव की हानि होती है। इसी प्रकार जिस भाव के कारक की राशि में पाप ग्रह हो, उस भाव के फल की हानि होती है। ऐसे ही जिस भाव तथा उसके कारक से पाप ग्रह की युति हो तब भी उस भाव का फल बहुत अल्प हो जाता है। उदाहरणार्थ नवम् भाव पिता का है तथा सूर्य नवम भाव का कारक है। मिथुन लग्न में नवमेश शनि होता है जो कारक सूर्य का वैरी है। अतः मिथुन लग्न में सूर्य की नवम भाव में स्थिति अशुभ फलदायक होगी। विभिन्न ज्योतिष ग्रंथों पर आधारित उपरोक्त विवचेन यह दर्शाता है कि 'कारको भाव नाशाय' पूर्ण सत्य नहीं है। केवल उसके आधार पर फलादेश करना सही नहीं होगा। भाव व भावेश की तरह भाव कारक के बल का शास्त्रोक्त पूर्ण आंकलन करने के उपरांत ही किसी भाव का फलादेश कहना चाहिए।