Thursday, January 31, 2019

खानों के अनुसार उपाय:-

खानों के अनुसार उपाय:-
1.खाना नम्बर एक: यदि आपकी कुंडली के पहले भाव में राहु और सातवें भाव में केतु हो तो चांदी की ठोस गोली अपने पास रखें।
 
2.खाना नम्बर दो: यदि आपकी कुंडली के दूसरे भाव में राहु और आठवें में केतु हो तो दो रंग या ज्यादा रंगों वाला कम्बल दान करें।
 
 
3.खाना नम्बर तीन: यदि आपकी कुंडली के तीसरे भाव में राहु और नवम भाव में केतु हो तो सोना धारण करें। बाएं हाथ की कनिष्ठा में सोने का छल्ला पहने या चने की दाल बहते पानी में बहाएँ।
 
4.खान नम्बर चार: यदि आपकी कुंडली के चौथे भाव में राहु और दसम भाव में केतु हो तो चाँदी की डिब्बी में शहद भरकर घर के बाहर जमीन में दबाए।
 
5.खान नम्बर पांच: यदि आपकी कुंडली के पांचवे भाव में राहु और ग्यारहवें भाव में केतु हो तो घर में चांदी का ठोस हाथी रखें।
 
 
6.खान नम्बर छह: यदि आपकी कुंडली के छटे भाव में राहु और बारहवें भाव में केतु हो तो बहन की सेवा करना, ताजे फुल को अपने पास रखना। कुत्ता पालना।
 
7.खाना नम्बर सात: यदि आपकी कुंडली के सातवें भाव में राहु और पहले भाव में केतु हो तो लोहे की गोली को लाल रंग से अपने पास रखना। चांदी की डिब्बी में बहते पानी का जल भरकर उसमें चांदी का एक चौकोर टुकड़ा डालकर तथा डिब्बी को बंद करके घर में रखने की सलाह दी जाती है। ध्यान रखते रहें कि डिब्बी का जल सूखे नहीं।
 
 
8.खाना नम्बर आठ: यदि आपकी कुंडली के अष्टम भाव में राहु और दूसरे भाव में केतु हो तो आठ सौ ग्राम सिक्के के आठ टुकड़े करके एक साथ बहते पानी में प्रवाहित करना अच्छा होगा।
 
9.खाना नम्बर नौ: यदि आपकी कुंडली के नवम भाव में राहु और तीसरे भाव में केतु हो तो चने की दाल पानी में प्रवाहित करें। चाँदी की ईंट बनवाकर घर में रखें।
 
10.खाना नम्बर दस: यदि आपकी कुंडली के दसम भाव में राहु और चौथे भाव में केतु हो तो पीतल के बर्तन में बहती नदी या नहर का पानी भरकर घर में रखना चाहिए। उस पर चांदी का ढक्कन हो तो अति उत्तम।
 
 
11.खाना नम्बर ग्यारह: यदि आपकी कुंडली के ग्यारहवें भाव में राहु और पांचवें भाव में केतु होने पर 400 ग्राम सिक्के के 10 टुकड़े करा कर एक साथ बहते जल में प्रवाहित करना चाहिए। इसके अलावा 43 दिनों तक गाजर या मूली लेकर सोते समय सिरहाने रखकर सुबह मंदिर आदि पर दान कर दें।
 
12.खाना नम्बर बारह: यदि आपकी कुंडली के बारहवें भाव में राहु और छटे भाव में केतु हो तो लाल रंग की बोरी के आकार की थैली बनाकर उसमें सौंफ या खांड भर कर सोने वाले कमरे में रखना चाहिए। कपड़ा चमकीला न हों। केतु के लिए सोने के जेवर पहनना उत्तम होगा।
 
 
सावधानी : उपरोक्त बताए गए उपायों को लाल किताब के किसी योग्य ज्योतिष से सलाह लेकर ही अमल में लाएं, क्योंकि कुंडली के अन्य ग्रहों का विश्लेषण भी करना होता है।

*!! हिन्दू सनातन धर्र्म में मांसाहार बर्जित है !!*

*!! हिन्दू सनातन धर्र्म में मांसाहार बर्जित है !!*

ऋग्वेद, यजुर्वेद, महाभारत, रामायण तथा अन्य वैदिक ग्रंथो में मदिरा सेवन व् मांसाहार की घोर निंदा की गई हे.और इसके कई सारे प्रमाण ग्रंथो में मिलते हे. दीर्घ द्रष्टा ऋषियो ने इसको दुर्व्यसन व् अधःपतन का प्रमुख कारण माना हे. मनुस्मृति, पराशर स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति में भी इसका निषेध किया गया हे.
आर्य संस्कृति और सनातन धर्म ऐसे दुर्व्यसनो का हमेसा विरोधी रहा हे. यह बात का ध्यान रखा जाए. अगर कोई हिन्दू वैदिक काल का प्रमाण देकर मदिरापान औरमांसाहार करता हे तो वह गलत होगा. और साथ ही आज वर्तमान में भी कुछ देवी-देवताओ को मदिरा व्पशु बलि अर्पण की जाती हे लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हे की इसका सम्बन्ध वैदिक संस्कृति से हे. यह एक अंधश्रद्धा मात्र हे. क्युकी देवी देवता को मांस और बलि अर्पण करना वैदिक संस्कृति में नहीं हे.

जिसके कुछ प्रमाण यहाँ उपस्थित हे.
*- यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत:*
*तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यत:*
*यजुर्वेद ४०। ७*

जो सभी भूतों में अपनी ही आत्मा को देखते हैं, उन्हें कहीं पर भीशोक या मोह नहीं रह जाता क्योंकि वे उनके साथ अपनेपन की अनुभूति करते हैं | जो आत्मा के नष्ट न होने में और पुनर्जन्म में विश्वास रखते हों, वे कैसे यज्ञों में पशुओं का वध करने की सोच भी सकते हैं ? वे तो अपने पिछले दिनों के प्रिय और निकटस्थ लोगों को उन जिन्दा प्राणियों में देखते हैं |

*- ब्रीहिमत्तं यवमत्तमथो माषमथो तिलम्*
*एष वां भागो निहितो रत्नधेयाय दान्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च*
*अथर्ववेद ६।१४०।२*
हे दांतों की दोनों पंक्तियों !चावल खाओ, जौ खाओ, उड़द खाओ और तिल खाओ |
यह अनाज तुम्हारे लिए ही बनाये गए हैं | उन्हें मत मारो जो माता– पिता बनने की योग्यता रखते हैं |

*- अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि*
*- यजुर्वेद १।१*

- हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |

धर्म के नाम पर की जाने वाली हिंसा बंद की जाए... सनातन हिन्दू धर्म में हिंसा नहीं हे... म्लेच्छ एवं यवन जेसे अन्य जातिओ के लोगो ने वैदिक काल में हिंसा घुसाई हे... हिंसा करके अभक्ष्य खाने वाले लोग सनातनी नहीं हे. आर्य हिंसक नहीं थे. जिसका ज्वलंत उदहारण महाभारत में दर्शाया गया हे ..."सूरा- मत्स्या -मधु -मांसमासवं क्रूसरौदनम धुर्तेह प्रवर्तितं ह्येत्न्नेताद वेदेषु कल्पितम" अर्थात - शराब, मछली आदि का यज्ञ में बलिदान धूर्तो द्वरा प्रवर्तित किया गया हे ! वेदों में मांस बलि का विधान निर्दिष्ट नहीं हे. *(महा. शांति. २६४.९) *"मांस पाक प्रतिशेधाश्च तद्वत"* अर्थात- वैदिक कर्मो में विहाराग्नी में मांस पकाने का निषेध हे, (मीमांसा. १२.२.२) और इसे कई प्रमाण भारतीय शास्त्र में हे...अगर इतने बड़े वैदिक शास्त्र बलि का विरोध करते हे तो आज के मंदिरों और खास कर माई मंदिरों और शाक्त उपासको द्वारा हो रहे बलि विधानों की प्रमाणिकता प्रश्नीय हे...में दावे के साथ उनको गलत, मुर्ख एवं ढोंगी कहती हु. वह धार्मिक न होकर पाखंडी हे. बलि निषेध हे. हमारा हिन्दू धर्म *"सर्वं खल्विदं ब्रह्मं"* मानने वाला हे..

धन्ना और त्रिलॅचन

*🎌धन्ना और त्रिलॅचन🎌*

          *धन्ना गुरु था और त्रिलोचन शिष्य था। त्रिलोचन ब्राह्मण और धन्ना जाटों के वंश में आया था। धन्ना न सोचा कि त्रिलोचन को जाति का अंहकार है। पर उसे निकालना अर्थात तारना भी अवश्य है। चलो, इसके आगे मूर्ख बन जायें। यह सोचकर एक दिन जब त्रिलोचन ठाकुरों की पूजा कर रहा था तो उससे बोला कि दादा !  पूजा है तो बडी अच्छी, क्या एक ठाकुर मुझे भी दे सकते हो? त्रिलोचन ने जबाब दिया कि हाँ !  एक दुधारु गाय ला दे। धन्ना ने कहा कि दादा !  बहुत अच्छा! घर जाकर गाय ले आया। त्रिलोचन ने यह सोचकर कि यह मूर्ख है, इसे क्या पता कि ठाकुर क्या होता है? एक दुसेरी (दो सेर का) बाट लाकर उसके आगे पटक दिया और कहा कि जा ले जा।*

        *धन्ने को बाट का क्या करना था ?  लाकर रख दिया। एक दिन त्रिलोचन मूर्ति के मुँह से भोग लगाकर खुद खाने लगा तो धन्ना ने कहा, "दादा, ठाकुर के साथ ठगी ?" त्रिलोचन ने कहा, "मै तेरा मतलब नही समझा।" धन्ना ने कहा, "तू ठाकुर को कुछ खिलाता नही। मेरा ठाकुर तो खाता, पीता, हल जोतता, रहट चलाता , मतलब यह कि मेरे सब काम करता है।*

        *त्रिलोचन ने मज़ाक समझा। उसने पूछा कि मुझे दिखायेगा ? धन्ना ने कहा, "मेरे साथ चल, तुझे अभी दिखाता हूँ।" यह कहकर त्रिलोचन को कुएँ पर ले गया। कुएँ की रहट चल रही थी। धन्ना ने कहा, "देख, वह मेरी गाडी पर बैठा हुआ है।" त्रिलोचन के कहा, "मुझे तो नही दिखता।" अब जब डाक्टर फोडे को चीरता है तो उसकी कोशिश होती है कि जरा-सा भी मवाद बाकी न रह जायें।*

        *ठीक इसी प्रकार धन्ना ने त्रिलोजन को झिडकना शुरू किया कि तुझमें यह दोष है! यह कमी है! यह नुक्स है ! उसके बाद उपदेश देना शुरू कर दिया, जैसा कि राजा जनक ने सुखदेव के साथ व्यवहार किया था। आखिर जब सब कुछ साफ हो गया, तो उसे दिखा दिया।*

       *अगर जीव पाँच तत्वों वाला (मनुष्य) होकर एक तत्व वाले पत्थर को पूजें तो कितने अफसोस की बात है। एक तत्व वाला तो कुछ बोलेगा ही नही। सो सब धर्मों में कोई निकृष्ट धर्म है तो पत्थर पूजा है।*

       *सोचो, जिस कारीगर ने छाती पर पैर रखकर छेनियाँ मारी, पैरों के नीचे रौदा, उसने उस कारीगर को नही मारा !  इसके विपरीत, अगर मनुष्य, मनुष्य को पूजता है तो पढे-लिखे लोग कहते है कि यह आदम-परस्ती है।*

      *हुजूर महाराज जी कहते है कि देवी-देवता हमने देखे नही, गाय-भैस की बोली समझ नही आती। मनुष्य - मनुष्य की पूजा क्यों करें?  जबकि आज के समय मे सबके एक जैसे हकूक है। फिर आप समझाते है कि गुरू, हमें उस परमात्मा से मिलने का रास्ता समझाते है, अपनी पूजा के लिए कभी नही कहते। शब्द को ही गुरू कहते है।*

*शब्द गुरू, सुरत धुन चेला।*

      *🙏राधा स्वामी जी 🙏*